शाखा

संघ-कार्य की इकाई उसकी शाखा अर्थात् दैनिक मिलन का कार्यक्रम है। संघ की गतिविधियों में निष्ठापूर्वक भाग लेने वाला प्रत्येक सदस्य स्वयंसेवक कहलाता है। स्वयंसेवक से यह अपेक्षित है कि वह अपनी सामान्य दिनचर्या में से प्रतिदिन कम से कम एक घंटा संघ-शाखा के लिए निकाले। शाखा नित्य नियम से एक नियत स्थान पर, जिसे संघ-स्थान कहते हैं, नियत समय पर लगायी जाती है। किसी मैदान या अन्य सुविधाजनक स्थान पर प्रतिदिन प्रात:काल या सायंकाल (परिस्थिति को देखते हुए कहीं रात्रि में भी) आसपास के स्वयंसेवक एकत्र होते हैं। भगवा ध्वज का आरोहण कर उसका वन्दन और फिर कुछ व्यायाम या शारीरिक प्रशिक्षण, खेल, राष्ट्र या समाज से सम्बन्धित कोई चर्चा, प्रश्नोत्तर अथवा देशभक्ति-गीत का गायन इत्यादि सहज भाव से किन्तु अनुशासनपूर्वक सम्पन्न होते हैं और अन्त में मातृभूमि तथा ईश्वर की वन्दना करते हुए प्रार्थना करके शाखा का विसर्जन होता है। यहाँ खेल-खेल में और सहज चर्चाओं द्वारा संगठन, अनुशासन और देशभक्ति के पाठ तो स्वयंसेवक सहजता से सीख ही जाता है, साथ ही आदर्श नागरिक के जो संस्कार उसके मन पर पड़ते हैं उनसे उसका मनोबौद्धिक स्तर भी उन्नत, परिष्कृत और उदात्त बनता चला जाता है। स्वदेश के लिए मातृभूमि (माता) का भाव और साथी स्वयंसेवकों के प्रति बन्धुभाव एवं प्रेम उसके हृदय में अंकुरित होता है। उनके तथा उनके परिवारों के सुख-दु:ख में अनुभव करने तथा राष्ट्र पर सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए तत्पर रहने का जो स्वभाव उसमें इस विशिष्ट संगति के परिणामस्वरूप विकसित होता है, उससे वह मानो एक नया ही व्यक्ति बनकर उभरता है। उसके जीवन को एक उच्च ध्येय प्राप्त हो जाता है। यही संघ द्वारा व्यक्ति-निर्माण या चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया है। 

नारायण शाखा



"भगवान विष्णु का नाम नारायण भी है। "

चार भुजाधारी भगवान विष्णु के दाहिनी एवं ऊर्ध्व भुजा के क्रम से अस्त्र विशेष ग्रहण करने पर केशव आदि नाम होते हैं अर्थात, दाहिनी ओर का ऊपर का हाथ, दाहिनी ओर का नीचे का हाथ, बायीं ओर का ऊपर का हाथ और बायीं ओर का नीचे का हाथ- इस क्रम से चारों हाथों में शंख, चक्र आदि आयुधों को क्रम या व्यतिक्रमपूर्वक धारण करने पर भगवान की भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ होती हैं। उन्हीं संज्ञाओं का निर्देश करते हुए यहाँ भगवान का पूजन बतलाया जाता है। पद्म, गदा, चक्र और शंख के क्रम से शस्त्र धारण करने पर उन्हें 'नारायण' कहते हैं। सम्पूर्ण जीवों के आश्रय होने के कारण भगवान श्री विष्णु ही नारायण कहे जाते हैं। कल्प के प्रारम्भ में एकमात्र सर्वव्यापी भगवान नारायण ही थे। वे ही सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि करके सबका पालन करते हैं और अन्त में सबका संहार करते हैं।

नारायण शाखा बस्ती का मानचित्र 


नारायण शाखा टोली का परिचय 


नारायण शाखा बस्ती व उपबस्ती प्रमुख का परिचय 


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